DongarGarh Mandir | बम्लेश्वरी माता – Photo, सीढ़ी, History

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इस पोस्ट में छत्तीसगढ़ के राजनांद गांव में स्थित माँ Bamleshwari Mata के Dondargarh Mandir के बारे में जानेंगे और उनकी Photo, सीढ़ी, History, Contact number, timing, दुरी के बारे में जानेंगे।

छत्तीसगढ़ में पहाड़ों से घिरा हुआ है (surrounded by mountains) डोंगरगढ़। डोंगरगढ़ एक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में Famous है। यहां हजारों वर्षों पुराना माँ बम्लेश्वरी का मंदिर है , जो हजारों फीट की ऊंचाई पर है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालु हजारों सीढ़िया चढ़कर माता के दर्शन करने आते है। कहा जाता है कि मां बम्लेश्वरी शक्तिपीठ का इतिहास 2000 वर्ष पुराना हैं। प्राचीन समय में डोंगरगढ़ वैभवशाली कामाख्या नगरी के रूप में जाना जाता था।

डोंगरगढ़ मंदिर और माँ बम्लेश्वरी देवी का परिचय

1,600 फीट ऊंची पहाड़ी की चोटी पर स्थित माँ बमलेश्वरी देवी मंदिर, एक लोकप्रियस्थल है। यह महान आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Importance) का है और इस मंदिर के साथ कई किंवदंतियों (legends) को भी शामिल किया गया है । आसपास के इलाके में एक और प्रमुख मंदिर छोटा बोलेश्वरी मंदिर है। भक्त नवरात्रि के दौरान इन मंदिरों में इकठ्ठा होते हैं । शिवजी मंदिर और भगवान हनुमान को समर्पित (Dedicated) मंदिर भी यहां स्थित हैं । रोपेवे (ropeway) एक अतिरिक्त आकर्षण (Another attraction) और छत्तीसगढ़ में एकमात्र यात्री रोपेवे (passenger ropeway) है । हिंदुओं के अलावा बौद्धों, सिखों, ईसाइयों और जैनों की भी यहाँ काफी आबादी है ।

इस कड़ी में हम जानेंगे कि डोंगरगढ़ में ऐसा क्या खास है जिसे लोग दूर दूर से देखने आते हैं ।माता के भक्त नंगे पैर दर्शन के लिए चले आते हैं

डोंगरगढ़ मंदिर का इतिहास (History)

डोंगरगढ़ को कामाख्या नगरी एवं डुंगराज्यनगर के नाम से भी जाना जाता था।जहां मौजूद खंडहरों (Ruins) एवं स्तंभों (pillar) के बनावट के आधार पर शोधकर्ताओं (Researchers) ने इसे कलचुरी काल मेंनिर्मित बताया, जो 12वीं – 13वीं सदी के दौरान छत्तीसगढ़ के आसपास क्षेत्रों में राज कियाकरते थे।इसी तरह मूर्तियों के गहने, अनेक वस्त्रों, आभूषणों, मोटे होंठ एवं मस्तक के लंबे बाल के आधार पर मीमांसा (epistemology) किया तो यह ज्ञात हुआ कि इसमें गोंड कला का भी प्रभाव परिलक्षित (Reflected) होता है और मूर्ति कला में गोंड कला का योगदान दिखता है इस शोध के माध्यम से शोधकर्ताओं को डूंगरगढ़ के इतिहास (The History of Dongargarh) के बारे में जानने का एक रास्ता मिला।

इस शोध से यह अनुमान लगाया (Guessing) जा सकता है कि 16 वीं शताब्दी तक डुंगराज्य नगर गोड राजाओं के आधिपत्य मे रहा। गोड राजा पर्याप्त सामर्थ्यवान थे। जिससे राज्य मे शांति तथा व्यवस्था स्थापित थी। यहां की प्रजा भी सम्पन्न थी। जिसके कारण मूर्तिशिल्प तथा गृह निर्माण कला (Building construction) का उपयुक्त वातावरण था।

अब से 2200 साल पहले डोंगरगढ़ के प्राचीन नाम कामख्या नगरी में राजा वीरसेन का शासन हुआ करता था, वे नि:संतान थे।पुत्र रत्न की कामना हेतु उसने महिषामती पुरी (मध्यप्रदेशमेंमंडला) मे स्थित शिवजी और भगवती दुर्गा की उपासना की।जिसके फलस्वरूप रानी कोएक वर्ष पश्चात पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योतिषियों ने नामकरण मे पुत्र का नाम मदनसेन रखा।भगवान शिव एवं माँ दुर्गा की कृपा से राजा वीरसेन को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

इसी भक्ति भाव से प्रेरित होकर कामाख्या नगरी मे माँ बम्लेश्वरी (जगदम्बे महेश्वर) का मंदिर बनवाया गया। माँ बम्लेश्वरी को जगदम्बा जिसमें भगवान शिव अर्थात महेश्वर की शक्ति विद्यमान है, के रूप मे जाना जाने लगा। राजा मदनसेन एक प्रजा सेवक शासक थे। उनके पुत्र हुए राजा कामसेन जिनके नाम पर कामाख्या नगरी का नाम कामावती पुरी रखा गया।

डोंगरगढ़ में माता देवाला का परिचय

डोंगरगढ़ एक ऐतिहासिक नगरी है जहां मां बमलेश्वरी देवी का निवास है और अपनी अद्भुत छटा बिखेरते हुए वह अपने भक्तों का मनोकामना पूर्ण करती है मां बमलेश्वरी के नगरी में नवरात्रि के समय प्रतिवर्ष दो मेले आयोजित होते हैं जिसमें भक्तों की लाखों की संख्या में भीड़ इकट्ठी होती है और मेले का आनंद लेती है पहाड़ी की चोटी में स्थित मां बमलेश्वरी का मंदिर ऊपर से मानो स्वर्ग दिखता है चारों तरफ हरियाली और छोटे बड़े जलाशय नजर आते हैं।

उत्तर (North) में ढारा जलाशय , दक्षिण (South) में मडियान जलाशय, पश्चिम (West)में पनिया जोब जलाशय से घिरा प्राकृतिक सुंदरता (Natural Beauty) से परिपूर्ण स्थान है डोंगरगढ़।कांक्रीट की सीढ़ियों ने पहाड़ी को चीरकर अपना रास्ता बनाया है जिस पर मानो ऐसा लगता है कि हरियाली कब्जा जमाना चाहता है। पहाड़ी पर थोड़ा ऊपर चढ़ने पर एक सुंदर झील (Lake) दिखाई देती है जिसका नाम है ‘कामकंदला’।

डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी के दो मंदिर हैं। एक मंदिर पहाड़ी के नीचे है और दूसरा पहाड़ी के ऊपर। पहाड़ी के नीचे के मंदिर को बड़ी बमलई का मंदिर और पहाड़ी के नीचे के मंदिर को छोटी बमलई का मंदिर कहा जाता है। छोटी बम्लेश्वरी देवी मंदिर पहाड़ी से लगभग 300 मीटर की दूरी पर स्थित है।

ये मंदिर अंचल के देवी भक्तों के श्रद्धा का केंद्र है. माता रानी की प्रतिमा में सिंदूर, सुहाग, सृंगार, कुमकुम, गुलाल और बंदन चढ़ाया जाता है. इसके साथ ही नारियल और अगरबत्ती से माता की पूजा-अर्चना की जाती है. माता में भक्तों की आस्था इतनी प्रगाढ़ है कि वो दूर-दूर से दर्शन के लिए चले आते हैं.

मंदिर तक कैसे पहुंचे

डोंगरगढ़ का ये बम्लेश्वरी मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध है। यहां माता के 2 मंदिर है। जिनमे से एक 1 हजार 6 सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित है। जिसे बड़ी बम्लेश्वरी कहा जाता है। वही नीचे भी माता का एक स्वरुप विराजमान है।समतल का ये मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से विख्यात है। ऊपर और नीचे स्थित मां के रूप को बड़ी और छोटी बहन के रूप में जाना जाता है।

1600 सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में माता के दर्शन के लिये 1000 सौ सीढ़िया चढ़नी पड़ती है। इस मंदिर का पट सुबह 4 बजे से ही खुल जाता है। दोपहर में 1 से 2 के बीच माता के द्वार का पट बंद किया जाता है। 2 बजे के बाद इसे रात के 10 बजे तक दर्शन के लिए खुला रखा जाता है। नवरात्री में ये मंदिर 24 घंटे खुला रहता है। बम्लेश्वरी माता के अलावा यहां बजरंगबली मंदिर, नाग वासुकी मंदिर, शीतला और दादी मां जैसे और भी मंदिर स्थित है।

मध्य प्रदेश से क्या नाता है?

मां बम्लेश्वरी को मध्यप्रदेश के उज्जैन (उज्जैनयी) के राजा विक्रमादित्य की कुल देवी भी कहा जाता है। इतिहासकारों ने इसे कल्चुरी काल का माना है।

कामाख्या नगरी का नाम कामावती पुरी रखा

राजावीर सेन के पुत्र का नाम मदन सेन था। राजा मदन सेन एक प्रजा सेवक (People servant ) शासक थे।उनके पुत्र हुए राजा कामसेन जिनके नाम पर कामाख्या नगरी का नाम कामावती पुरी रखा गया।

Night Stay

देश-विदेश से आने वालेTourist और श्रद्धालुओं के Night Stay के लिए यहां धर्मशाला बनाया गया है और इसके अलावा यहां Private Hotals भी उपलब्ध हैं जहां अच्छी Facility के साथ Light &पानी की उपलब्धता Confirm की गई है ।

डोंगरगढ़ का Location

डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ राज्य में राजनांदगांव जिले का एक City और Municipality है तथा माँ बांम्बलेश्वरी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है । राजनांदगांव जिले में एक प्रमुख तीर्थ स्थल, शहर राजनांदगांव से लगभग 35 किमी पश्चिम (West) में स्थित है, दुर्ग से 67 किलोमीटर पश्चिम (West) और भंडारा से 132 किलोमीटर पूर्व (East)  में राष्ट्रीय राजमार्ग 6 (NH 6)  पर स्थित है । राजसी पहाड़ों और तालाबों के साथ, डोंगगढ़ शब्द से लिया गया है: डोंगगढ़ का मतलब ‘पहाड़’ और गढ़ अर्थ ‘किला’ है।

डोंगरगढ़ पहुंचे

Railway Station – सबसे नजदीकी रेल्वे स्टेशन डोंगरगढ़ है जो कि मुंबई-हावड़ा (Mumbai- Hawda Main Line)  से जुड़ा हुआ (Connect) है।

Bus Stand – सबसे नजदीकी बस स्टेण्ड डोंगरगढ़ है लेकिन डोंगरगढ़ से लगभग 35 किमी दूर स्थित राजनांदगांव अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है। 

By Road – डोंगरगढ़,राजनांदगांवसेलगभग35किमीहैऔररायपुरसेलगभग105किमीहै।इसके अलावा कई गांवों के रास्तों से भी डोंगरगढ़ पंहुचा जा सकता है ।

Airport – सबसे नजदीकी एयरपोर्ट रायपुर है जो कि डोंगरगढ़ से लगभग 105 किमी दूर है। जो मुंबई, दिल्ली, नागपुर, हैदराबाद, बैगलूरु, विशाखापट्नम और चैन्नई से Connect है।

घूमने के लिए सही समय जून से मार्च तक है।

यहां यात्रियो की सुविधा हेतु पहाडो के ऊपर पेयजल की व्यवस्था, विद्युत, प्रकाश, विश्रामालयों के अलावा भोजनालय व धार्मिक सामग्री खरीदने की सुविधा है।

कामकन्दला और माधवनल की प्रेमकथा

डोंगरगढ़ के प्रसिद्धि में काम कांधला और माधव नल के प्रेम कथा का महत्वपूर्ण योगदान है।कामकन्दला, राजा कामसेन के राज दरबार मे नर्तकी थी। वही माधवनल निपूर्ण संगीतज्ञ हुआ करता था।

एक बारकीबातहै, राजा के दरबार मे कामकन्दला के नृत्य का आयोजन हुआ परन्तु ताल एवं सुर बिगडने से माधवनल ने कामकन्दला के पैर के एक पायल मे नग न होना व मृदंग बजाने वाले का अंगुठा नकली अर्थात मोम का होना जैसी त्रुटि निकाली। इससे राजा कामसेन अत्यन्त प्रभावित हुए और उसने अपनी मोतियों माला उन्हे सौपकर माधवनल के सम्मान मे नृत्य करने को कहा।

कामकन्दला के नृत्य से प्रभावित होकर माधवनल ने राजा कामसेन की दी हुई मोतियो की माला कामकन्दला को भेट कर दी। इससे राजा क्रोधित हो गया। उन्होने माधवनल को राज्य से निकाल दिया लेकिन माधवनल राज्य से बाहर न जाकर डोंगरगढ की पहाडियो की गुफा मे छिप गया। प्रसंगवश कामकन्दला व माधवनल के बीच प्रेम अंकुरित हो चुका था। कामलन्दला अपनी सहेली माधवी के साथ छिपकर माधवनल से मिलने जाया करती थी।

दूसरी तरफ राजा कामसेन का पुत्र मदनादित्य पिता के स्वभाव के विपरीत नास्तिक व अय्याश प्रकृति का था। वह कामकन्दला को मन ही मन चाहता था और उसे पाना चाहता था। मदनादित्य के डर से कामकन्दला उससे प्रेम का नाटक करने लगी।

एक दिन माधवनल रात्रि मे कामकन्दला से मिलने उसके घर पर था कि उसी वक्त मदनादित्य अपने सिपाहियो के साथ कामकन्दला से मिलने चला गया। यह देख माधवनल पीछे के रास्ते से गुफा की ओर निकल गया। घर के अंदर आवाजे आने की बात पूछ्ने पर कामकन्दला ने दीवारों से अकेले मे बात करने की बात कही।

इससे मदनादित्य संतुष्ट नही हुआ और अपने सिपाहियो से घर पर नजर रखने को कहकर महल की ओर चला गया। एक रात्रि पहाडियो से वीणा की आवाज सुन व कामकन्दला को पहाडी की तरफ जाते देख मदनादित्य रास्ते मे बैठकर उसकी प्रतिक्षा करने लगा परन्तु कामकन्दला दूसरे रास्ते से अपने घर लौट गई। मदनादित्य ने शक होने पर कामकन्दला को उसके घर पर नजरबंद कर दिया।

इस पर कामकन्दला और माधवनल माधवी के माध्यम से पत्र व्यवहार करने लगे किन्तु मदनादित्य ने माधवी को एक रोज पत्र ले जाते पकड लिया। डर व धन के प्रलोभन से माधवी ने सारा सच उगल दिया। मदनादित्य ने कामकन्दला को राजद्रोह के आरोप मे बंदी बनाया और माधवनल को पकडने केलिएसिपाहियो को भेजा। सिपाहियो को आते देख माधवनल पहाडी से निकल भागा और उज्जैन जा पहुचां।

उस समय उज्जैन मे राजा विक्रमादित्य का शासन था जो बहुत ही प्रतापी और दयावान राजा थे। माधवनल की करूण कथा सुन उन्होने माधवनल की सहायता करने की सोच अपनी सेना कामाख्या नगरी पर आक्रमण कर दिया। कई दिनो के घनघोर युध्द के बाद विक्रमादित्य विजयी हुए एवं मदनादित्य, माधवनल के हाथो मारा गया। घनघोर युध्द से वैभवशाली कामाख्या नगरी पूर्णतः ध्वस्त हो गई।

चारो ओर शेष डोंगर ही बचे रहे तथा इस प्रकार डुंगराज्य नगर पृष्टभुमि तैयार हुई। युध्द के पश्चात विक्रमादित्य द्वारा कामकन्दला एवं माधवनल की प्रेम परीक्षा लेने हेतु जब यह मिथ्या सूचना फैलाई गई कि युध्द मे माधवनल वीरगति को प्राप्त हुआ तो कामकन्दला ने ताल मे कूदकर प्राणोत्सर्ग कर दिया। वह तालाब आज भी कामकन्दला के नाम से विख्यात है। उधर कामकन्दला के आत्मोत्सर्ग से माधवनल ने भी अपने प्राण त्याग दिये।

अपना प्रयोजन सिध्द होते ना देख राजा विक्रमादित्य ने माँ बम्लेश्वरी देवी (बगुलामुखी) की आराधना की और अतंतः प्राणोत्सर्ग करने को तत्पर हो गये। तब देवी ने प्रकट होकर अपने भक्त को आत्मघात से रोका। तत्पश्चात विक्रमादित्य ने माधवनल कामकन्दला के जीवन के साथ यह वरदान भी मांगा कि माँ बगुलामुखी अपने जागृत रूप मे पहाडी मे प्रतिष्टित हो। तबसे माँ बगुलामुखी अपभ्रंश बमलाई देवी साक्षात महाकाली रूप मे डोंगरगढ मे प्रतिष्ठित है ।

राजनांदगांव के Tourist Places

● पाताल भैरवी मंदिर- बरफानी धाम छत्तीसगढ़ में राजनंदगांव शहर में एक मंदिर है। मंदिर के शीर्ष पर एक बड़ा शिव लिंग देखा जा सकता है, जबकि इसके सामने एक बड़ी नंदी प्रतिमा खड़ी है। मंदिर तीन स्तरों में बनाया जाता है। नीचे की परत में पाताल भैरवी का मंदिर है, दूसरा नवदुर्गा या त्रिपुर सुंदरी मंदिर है और ऊपरी स्तर में भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की प्रतिमा है।

● मनगटा वन्यजीव पार्क- मनगटा के इस पर्यावरण पार्क में अभी 250 चीतल, 150 जंगली सूअर, मोर, लकड़बग्घा, खरगोश, जंगली बिल्ली व अन्य छोटे-छोटे जंगली जानवर है। यहां चीतलों की संख्या काफी है, इस कारण पर्यटकों के लिए यह आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

● खारा रिजर्व वन-खारा एक आरक्षित वन है ।

खरखराबांध– यह खरखारा नदी पर बना पूर्णतः मिट्टी से बना हुआ बांध है जिसकी लंबाई लगभग 1128 मीटर है। यहां एक साइफन परियोजना बनाया गया है।इसका प्रवाहित क्षेत्र बालोद, कांकेर, दुर्ग है।

★Website

ट्रस्टनेभक्तोंकेलिएएकवेबसाइटभीLaunchकियाहै,

Official Website – Click करें

डोंगरगढ़ के वेबसाइट में सुविधा-

 ● Ropeway Ticket Booking

● कुंवार नवरात्रि 2021 ज्योति कलश बुकिंग

● ऑनलाइन दर्शन (ऊपर मंदिर)

● ऑनलाइन दर्शन (नीचे मंदिर)

● रोपवे संचालन एवं रखरखाव हेतु निविदा

Online दर्शन

चैत्र नवरात्रि पर्व में भक्तों की आस्था को देखते हुए मंदिर प्रबंधन समिति ने यह फैसला लिया है। इसके लिए ट्रस्ट समिति ने वेबसाइट जारी की है। इस वेबसाइट में जाकर ऊपर मंदिर, नीचे मंदिर तथा ज्योति कलशों के दर्शन भक्त करेंगे। कोरोना काल मे लॉकडाउन का असर नवरात्रि पर्व में भी पड़ रहा है।लगातार तीसरी बार माई की नगरी डोंगरगढ़ में लगने वाले नवरात्र मेले में कोरोना के चलते ग्रहण लग गया है। आस्था व भक्ति का महापर्व चैत्र नवरात्रि कोरोना के साए में घर बैठे शुरू हो गया है।

मां बमलेश्वरी के ऑनलाइन दर्शन यहां करें क्लिक: Https://Live.Bamleshwari.Org/….

डोंगरगढ़ मंदिर Contact Number

Maa Bamleshwari Mandir, Dongargarh

Shri Bamleshwari Mandir Trust Samiti Chhirpani, Dongargarh

Dist: Rajnandgaon Chhattisgarh – 491445

Phone – 07823- 232990, 232909,232999

Email – [email protected]

महामारी के दौरान स्थिति

कोरोना काल के दौरान श्री बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट समिति डोंगरगढ़ द्वारा महामारी से फैले संकट को देखते हुए मुख्यमंत्री सहायता कोष में11 लाख रुपये की राशि जमा कराई गई।

मंदिर ट्रस्ट

 सन 1964 मे खैरागढ रियासत के भुतपूर्व नरेश श्री राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने ट्रस्ट का गठन कर मंदिर के संचालन का काम जनता को सौंप दिया। डोंगरगढ के पहाड मे स्थित माँ बम्लेश्वरी के मंदिर को छत्तीसगढ का समस्त जनसमुदाय तीर्थ मानता है।

Tourist Record Report

राज्य पर्यटन विभाग की 2014 की वार्षिक प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, 2014 के दौरान बड़ी संख्या में 2.44 करोड़ पर्यटकों ने छत्तीसगढ़ का दौरा किया। यह आंकड़ा 2013 की जनगणना के अनुसार राज्य की वर्तमान जनसंख्या 25.55 मिलियन के करीब है।रिपोर्ट यह भी बताती है कि 80 लाख पर्यटकों ने राजनांदगांव जिले का दौरा किया, जहां बम्बलेश्वरी मंदिर स्थित है।

हाल ही में लोकसभा में केंद्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा द्वारा दिए गए एक जवाब के अनुसार, ताजमहल में 2014 में लगभग 60 लाख पर्यटकोंकीसंख्यादर्जकीथी।गोवा पर्यटन वेबसाइट बताती है कि 2014 में लगभग 40 लाख पर्यटकोंकीसंख्या दर्ज किया था।

जसगीत

छत्तीसगढ़ में जस गीत का प्रचलन बहुत पहले से है। छत्तीसगढ़वासी माता जस गीत को बड़ी श्रद्धा से मन लगाकर सुनते हैं ।ऐसी ही श्रद्धा मां बमलेश्वरी के लिए भी है जिनके दर्शन मात्र से मनोकामना पूर्ण हो जाती है ।मां बमलेश्वरी का जस गीत पूरे छत्तीसगढ़ में Famous है । यह जस गीत छत्तीसगढ़ी के अलावा हिंदी और बघेली भाषा में भी Available है । छत्तीसगढ़ के रायपुर में स्थित सुंदरानी वीडियो वर्ल्ड में बमलेश्वरी माता के जस गीत का प्रचार प्रसार किया उन्होंने अपने स्टूडियो के माध्यम से मां बमलेश्वरी की महिमा का बखान किया ।आपइसेYoutubeमेंदेखऔरसुनसकतेहैं।

छत्तीसगढ़ में ऐसे अनेक गायक हुए जिन्होंने अपनी गायकी के माध्यम से मां बमलेश्वरी के रूप को लोगों के सामने लाएं । प्रमुख गायक इस प्रकार हैं दिलीप षडंगी, दुकालू यादव, अलका चंद्राकर, कविता वासनिक, संजो बघेल, कांतिकार्तिक यादव, प्रेम बालाघाटी, इत्यादि।

Blog Video

आज कोरोना के दौर में लोग कहीं घूमने नहीं जा पा रहे हैं और इसके अलावा कई मुश्किलें रहती है जिसके वजह से लोग डोंगरगढ़ जाने में असमर्थ होते हैं तो ऐसे मौकों पर Online Video ही काम आता है

आप Youtube के माध्यम से मांबम्लेश्वरी का दर्शन कर सकते हैं। डोंगरगढ़ के बारे में सम्पूर्ण जानकारी ले सकते हैं।आपको ऐसा नहीं लगेगा कि मैं अपने घर से दर्शन कर रहा हूं या रही हूं।वेबसाइट के माध्यम से आप माता का दर्शन कर सकते हैं।

“जय माँ बमलाई आपकी कृपा मुझ बेटे पर बनी रहे”

ॐ जगदम्बिके दुर्गाये नमः

FAQ’s:

डोंगरगढ़ में कितनी सीढ़ी है?

डोंगरगढ़ मंदिर में माता बम्लेश्वरी देवी के दर्शन स्थल तक पहुँचाने के लिए लगभग 1100 से भी अधिक सीढ़ी है।

डोंगरगढ़ कौन से जिला में है?

डोंगरडाढ़ छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांद गांव जिला के पश्चिम में 20 की दुरी पर स्थित है।

राजनांदगांव से डोंगरगढ़ कितना किलोमीटर है?

राजनांदगांव से डोंगरगढ़ की दुरी लगभग 20 किलोमीटर है जहां बस, कार या मोटर साइकिल से लगभग 30 मिनट में पहुंचा जा सकता है।

डोंगरगढ़ जाने में कितना टाइम लगेगा?

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से पश्चिम दिशा की ओर NH 46 सीधा डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी माता मंदिर को जाता है, जिसकी दुरी 108 किलोमीटर है जहां बस, कार या मोटर साइकिल से लगभग 2 घंटा 30 मिनट में पहुंचा जा सकता है।

डोंगरगढ़ से खैरागढ़ कितना किलोमीटर है?

डोंगरगढ़ उत्तर-पूर्व दिशा की ओर खैरागढ़ स्थित है जिसकी दुरी लगभग 40 किलोमीटर है।

दुर्ग से डोंगरगढ़ कितना किलोमीटर है?

दुर्ग से डोंगरगढ़ 66 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है।

रायपुर से डोंगरगढ़ कितने किलोमीटर है?

रायपुर से पश्चिम दिशा की ओर NH 46 सीधा डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी माता मंदिर को जाता है, जिसकी दुरी 108 किलोमीटर है जहां बस, कार या मोटर साइकिल से लगभग 2 घंटा 30 मिनट में पहुंचा जा सकता है।

बिलासपुर से डोंगरगढ़ कितना किलोमीटर है?

बिलासपुर से डोंगरगढ़ की दुरी 207 किलोमीटर है।

डोंगरगढ़ की ऊंचाई कितनी है?

डोंगरगढ़ की विख्यात माँ बम्लेश्वरी देवी की मंदिर समुद्र तल से 1600 फिट की ऊंचाई पर स्थित है।

डोंगरगढ़ का प्राचीन नाम क्या है?

डोंगरगढ़ का प्राचीन का प्राचीन नाम कामाख्या नगरी था।

लेखक- किररिहा बाराद्वार, जांजगीरचाम्पा, (छग)

I am Mukund from Chhattisgarh, India. This is a Hindi blog website, where various types of information and news are provided.

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