मौलिक अधिकार कितने हैं? महत्व, विशेषता, वर्गीकरण, निबंध

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भारत के Fundamental Rights या मौलिक अधिकार हिंदी में- प्रकार, कौन-कौन से हैं, विशेषता, महत्व, निबंध, किस देश से लिया है, संविधान भाग 3.

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Fundamental Rights या मौलिक अधिकार क्या है?

मौलिक अधिकार का अर्थ होता है वे अधिकार जो व्यक्ति के जीवन के मौलिक रूप से आवश्यक है, जिसे संविधान देश के नागरिकों को प्रदान करती है.

ये अधिकार किसी भी देश के संविधान के द्वारा वहां के नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं, जो नागरिकों के जीवन-यापन व सुरक्षा के दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है, Fundamental Rights या मौलिक अधिकार की रक्षा देश की सर्वोच्च न्यायलय करता है।

भारतीय संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) एक महत्वपूर्ण भाग है ! इस भाग से लगभग सभी Exam में एक न एक Question आता ही है, तो आज हम आपको मौलिक अधिकारों के वारे में संपूर्ण जानकारी देंगे…

मौलिक अधिकार का परिचय

Fundamental Rights भारत के प्रत्येक नागरिक को प्राप्त होता है।जिसने भारत की Citizenship ली है वह इसका हकदार होता है और भारत सरकार इसे सामान्य condition में सीमित नहीं कर सकती।संविधान सभी नागरिकों के लिए Individual और सामूहिक रूप से कुछ बुनियादी स्वतंत्रता देता है। जिन देशों के संविधान में मौलिक अधिकार का वर्णन नहीं होता है अथवा मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)  को संविधान में जगह नहीं मिलती है तो वह देश जल्द ही तानाशाही देश के रूप में Change हो जाता है ।राज्य शक्ति को यदि संवैधानिक रूप से Control में रखना है और राज्य की जनता को उनके Fundamental Rights  देना है तो संविधान में मौलिक अधिकार Important  होता है।यह व्यक्ति की मूलभूत स्वतंत्रता कोSecure करता है।

मौलिक अधिकार को  संविधान के भाग-3 में Article 12 से 35 तक Describe किया गया है।  मौलिक अधिकार वे मूलभूत अधिकार हैं जो किसी व्यक्ति के जीवनयापन हेतु मौलिक एवं अनिवार्य होने के कारण संविधान के द्वारा Citizens को Provide किया जाताहैं । संविधान के भाग III को ‘भारत का मैग्नाकार्टा’ की संज्ञा दी गई है।

ये अधिकार कई कारणों से मौलिक हैं-  Why Fundamental Rights are Fundamental

1. इन अधिकारों को मौलिक इसलिये कहा जाता है क्योंकि इन्हें देश के संविधान में स्थान दिया गया है तथा संविधान में संशोधन की प्रक्रिया (TheProcess of constitutional amendment) के अतिरिक्त उनमें किसी प्रकार का संशोधन नहीं किया जा सकता।

2. ये अधिकार व्यक्ति के प्रत्येक पक्ष के विकास हेतु मूल रूप में आवश्यक हैं, इनके अभाव में व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध (Block) हो जायेगा।

3. इन अधिकारों का उल्लंघन (violation) नहीं किया जा सकता (Fundamental rights cannot be violated)।

4. मौलिक अधिकार न्याय योग्य (justifiable) हैं तथा समाज के प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से प्राप्त होते है।

मौलिक अधिकार का निर्माण

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है ।भारतीय संविधान में सभी उपबन्धों (provisions) को विस्तृत और व्यापक रूप में अधिकारों को mentionकिया गया है। यह संघात्मक संविधान (Constitutional Constitution) का सबसे बड़ा रूप है ।सभी आधुनिक संविधानों में मूल अधिकारों (Fundamental rights) का उल्लेख है। इसलिए संविधान के अध्याय 3 को भारत का अधिकार – पत्र (Magna carta) कहा जाता है। ‘मैग्नाकार्टा’ अधिकारों का वह प्रपत्र है, जिसे इंग्लैंड के किंग जॉन द्वारा 1215 में सामंतों के दबाव में जारी किया गया था। यह नागरिकों के fundamental rights से related पहला लिखित प्रपत्र था।इस दस्तावेज को मूल अधिकारों का जन्मदाता कहा जाता है। इसके पश्चात् समय-समय पर सम्राट् ने अनेक अधिकारों को स्वीकृति प्रदान की।

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फ्रांस में सन् 1789 में जनता के मूल अधिकारों की एक Separate Record के रूप में announce की गयी, जिसे मानव एवं नागरिकों के अधिकार घोषणा-पत्र के नाम से जाना जाता है। इसमें उन अधिकारों को प्राकृतिक अप्रतिदेय (inalienable) और मनुष्य के पवित्र अधिकारों (Holy rights) के रूप में उल्लिखित किया गया है; यह Document एक लम्बे और Hard Work का result था।

जब भारत का संविधान निर्माण हो रहा था तो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तैयार थी जिसमें इंग्लैंड और फ्रांस के मूल अधिकारों के बारे में भारतीय विद्वानों ने अध्ययन (Study & Research)  किया और उसके फलस्वरुप भारतीय संविधान में मूल अधिकारों को शामिल किया।भारतीय संविधान में मूल अधिकारों की कोई परिभाषा नहीं की गई है।

मौलिक अधिकार किस देश से लिया गया है:-

संविधान के भाग 3 में उल्लेखित Article12 से 35 मौलिक अधिकारों के संबंध में है जिसे सऺयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है । मौलिक अधिकार सरकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हालतउपयोग करने से रोकने के साथ नागरिकों के अधिकारों की समाज द्वारा अतिक्रमण से रक्षा करने का दायित्व भी राज्य पर डालते हैं।

Fundamental Rights के प्रकार

मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे परन्तु वर्तमान में छः ही मौलिक अधिकार हैं | संविधान द्वारा मूल रूप से सात मूल अधिकार प्रदान किए गए थे- i) समानता का अधिकार, ii) स्वतंत्रता का अधिकार, iii) शोषण के विरुद्ध अधिकार, iv) धर्म स्वतंत्रता का अधिकार, v) संस्कृतिएवंशिक्षाकीअधिकारvi) संपत्ति का अधिकार तथा vii) संवैधानिक उपचारों का अधिकार। हालांकि, संपत्ति के अधिकार को 1978 में 44वें संशोधन द्वारा संविधान के तृतीय भाग से हटा दिया गया था।

भारत के नागरिकों को प्राप्त 6 मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं:

  1. समानता का अधिकार (Right to Equality): अनुच्छेद 14 से 18 तक।
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom): अनुच्छेद 19 से 22 तक।
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation): अनुच्छेद 23 से 24 तक।
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Religious Freedom): अनुच्छेद 25 से 28 तक।
  5. संस्कृति तथा शैक्षिक अधिकार (Cultural and Education related Right): अनुच्छेद 29 से 30 तक।
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional remedies): अनुच्छेद 32 से 35 तक।

साधारण कानूनी अधिकारों को राज्य द्वारा लागू किया जाता है तथा उनकी रक्षा की जाती है जबकि मौलिक अधिकारों को देश के संविधान द्वारा लागू किया जाता हैतथा संविधान द्वारा ही सुरक्षित किया जाता है।

भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का वर्णन या हमारे संविधान में नागरिकों को कितने मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।

1. समानता काअधिकार (Right to equality)

समता का अधिकार Article 14 से 18 तक वर्णित है जिसमें बताया गया है:-

  • अनुच्छेद 14 – विधि के समक्ष समता (equallaw)- भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जाएगा।कानून के समक्ष समानता।
  • अनुच्छेद 15 – जाति (Cast), लिंग (gender), धर्म (religion), तथा मूलवंश (Dynasty) के आधार पर सार्वजनिक स्थानों (Public Place) पर कोई भेदभाव (discrimination) करना इस Article के द्वारा restricted है। लेकिन बच्चों एवं महिलाओं को विशेष संरक्षण (Special Protection) का Provision है। अनुच्छेद 15 में यह Provision है कि राज्य द्वारा किसी नागरिक के प्रति केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान को लेकर विभेद (Distinction) नहीं किया जाएगा। अपवाद (exception) : महिलाओं, बच्चों, सामाजिक या शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों (socially or educationally backward people) या अनुसूचित जाति या जनजाति (SC/ST) के लोगों के उत्थान (जैसे- आरक्षण और मुफ्त शिक्षा तक पहुँच) के लिये कुछ प्रावधान किये जा सकते हैं।
  • अनुच्छेद 16 – लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता – सार्वजनिक नियोजन में अवसर की समानता प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है परंतु अगर सरकार जरूरी समझे तो उन वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान कर सकती है जिनका राज्य की सेवा में प्रतिनिधित्व कम है। भारतीय संविधान के Article 16 में राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिये अवसर की समता होगी। अपवाद(exception): राज्य नियुक्तियों (appointments) में reservation का प्रावधान करता है या किसी पद को पिछड़े वर्ग के पक्ष में बना सकता है जिसका कि राज्य में समान representation नहीं है। इसके अतिरिक्त किसी संस्था या इसके कार्यकारी परिषद (Executive Council) के सदस्य या किसी भी धार्मिक आधार पर व्यवस्था की जा सकती है।
  • अनुच्छेद 17 – इस अनुच्छेद के द्वारा अस्पृश्यता (untouchability) का अंत किया गया है अस्पृश्यता का आचरण कर्ता को रू 500 जुर्माना अथवा 6 महीने की कैद का प्रावधान है। यह प्रावधान भारतीय संसद अधिनियम 1955 द्वारा जोड़ा गया। इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई उपाधियों का अंत (Abolition of titles) कर दिया गया। सिर्फ शिक्षा (academic) एवं रक्षा (military) में उपाधि देने की परंपरा कायम रही है। 
  • अनुच्छेद 18 – उपाधियों का अंत– सेना या विधा संबंधी सम्मान के सिवाए अन्य कोई भी उपाधि राज्य द्वारा प्रदान नहीं की जाएगी. भारत का कोई नागरिक किसी अन्य देश से बिना राष्ट्रपति की बिना अनुमति के कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता है। इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई उपाधियों का अंत (Abolition of titles) कर दिया गया। सिर्फ शिक्षा (academic) एवं रक्षा (military) में उपाधि देने की परंपरा कायम रही।

2. स्वतंत्रता का अधिकार (Right to freedom)

अनुच्छेद 19 से22 तक सभी नागरिकों को स्वतंत्रता के छह अधिकारों की गारंटी देता है:

 अनुच्छेद 19: संविधान में 6 तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख है।

  • 19(अ): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार(right to freedom of speech and expression) – यह प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति दर्शाने, मत देने, विश्वास एवं अभियोग लगाने की मौखिक, लिखित, छिपे हुए मामलों पर स्वतंत्रता देता है।
  • 19(ब): शांतिपूर्वक सम्मेलन में भाग लेने की स्वतंत्रता का अधिकार(right to freedom of attend the conference peacefully) – किसी भी नागरिक को बिना हथियार (weapons) के शांतिपूर्वक संगठित होने का अधिकार है। इसमें सार्वजनिक बैठकों (Public meetings) में Participate करने का अधिकार एवं प्रदर्शन शामिल है। इस स्वतंत्रता का उपयोग केवल सार्वजनिक भूमि पर बिना हथियार के किया जा सकता है।यह व्यवस्था हिंसा(violence), अव्यवस्था (disorder), गलत संगठन एवं सार्वजनिक शांति भंग करने के लिये नहीं है।
  • #19(स): संघ बनाने का अधिकार (right to form associations or union) – इसमें राजनीतिक दल (political party) बनाने का अधिकार, कंपनी, साझा फर्म (joint firm), समितियाँ, क्लब, संगठन (Organization) , व्यापार संगठन या लोगों की अन्य इकाई बनाने का अधिकार शामिल है।
  • 19(द):बिना रोक टोक के घूमने की स्वतंत्रता का अधिकार (to move freely throughout the territory of India) –देश के किसी भी क्षेत्र मे स्वतंत्रता पूर्वक भ्रमण करने की स्वतंत्रता ।
  • #19(इ):निवास का अधिकार(to reside and settle in any part of the territory of India) – जनजातीय क्षेत्रों में उनकी संस्कृति (culture), भाषा (language), एवं रिवाज (Custom) के आधार पर बाहर के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है। देश के कई भागों में जनजातियों को अपनी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन (Protection and enhancements) हेतु नियम-कानून बनाने का अधिकार है।
  • 19 (फ): संपत्ति का अधिकार
  • 19(ग):व्यवसाय आदि की स्वतंत्रता का अधिकार (Freedom of work)- इस अधिकार में कोई अनैतिक कृत्य (Immoral act) शामिल नहीं है, जैसे- महिलाओं या बच्चों का दुरुपयोग या खतरनाक (हानिकारक औषधियों या विस्फोटक आदि) व्यवसाय।

अनुच्छेद 20अपराध के लिए दोषसिद्धि के संबंध में 3 तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख है।

  • (अ): किसी भी व्यक्ति को एक अपराध के लिए केवल एक ही बार सजा मिल सकती है। 
  • (ब):अपराध करने के समय जो कानून है इसी के तहत सजा मिलेगी।
  • (स):किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध न्यायालय में गवाही देने के लिय बाध्य नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का सरंक्षण- किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रकिया के अतिरिक्त उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 21(क): राज्य 6 से 14 वर्ष के आयु के समस्त बच्चों के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा।

अनुच्छेद 22: कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध में संरक्षण– अगर किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से हिरासत में ले लिया गया हो, तो 3 प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। 

  1. गिरफ्तारी का कारण बताना होगा।
  2. गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर जज के सामने प्रस्तुत करना आवश्यक है।
  3. अपने पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (right against exploitation)

अनुच्छेद (23-24) के अंतर्गत निम्न अधिकार वर्णित हैं-

  • अनुच्छेद 23: के अनुसार मानव व्यापार (Human business) व बेगार (Forced labor) तथा बलात श्रम पर प्रतिबंध लगाया गया है । लेकिन राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिएसार्वजनिक सेवा या श्रम योजना लागू कर सकती है। राज्य इस सेवा में धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। बंधुआ मजदूरी (Bonded wages) समाप्त करने के लिए 1975 में बंधुआ मजदूरी का उन्मूलन अधिनियम पारित किया गया ।
  • अनुच्छेद 24: के अनुसार बाल श्रम (child labour) का निषेध किया गया है जिसके अनुसार 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे को कारखानो (factories), खदानों (mines) या खतरनाक कार्यों में नहीं लगाया जा सकता।इसकाउल्लंघनविधिकेअनुसारदंडनीयअपराधहै।

नोट:-जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करने के लिए Force किया जा सकता है।

4. धार्मिक स्वतंत्रता काअधिकार (Right to religious freedom)

Article (25-28) के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार वर्णित हैं:

  • अनुच्छेद 25: के अनुसार देश के प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म को मानने व आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार है। लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था व समाज कल्याण (social welfare) एवं सुधार आदि के अंतर्गत इस पर रोक लगाई जा सकती है।
  • अनुच्छेद 26 : के अनुसार धार्मिक प्रयोजन (Religious Purpose) के लिए संस्था बनाने, उसका पोषण करने और धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध (Management) के लिये सम्पत्ति अर्जित करने का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 27: के अनुसार किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष के पोषण हेतु कर देने के लिए Force नहीं किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 28: के अनुसार राज्य निधि से funded या Financial Help मिलनेवाली शिक्षण संस्थाओं (educational institutions) में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी और न ही किसी व्यक्ति को धार्मिक शिक्षा या धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

5. सांस्कृतिक तथा शैक्षिकअधिकार (Cultural and education related rights)

अनुच्छेद(29-30) के अंतर्गत प्राप्त अधिकार-

  • अनुच्छेद 29: के अनुसार देश के प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषाए लिपि या संस्कृति(Language, Script & Culture) को सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार होगा ! राज्य द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त (Economic Aided) किसी भी शिक्षण संस्था में किसी भी नागरिक को धर्म व मूलवंश व जाति और भाषा आदि के आधार पर प्रवेश लेने से वंचित नही किया जा सकता।
  • अनुच्छेद 30: के अनुसार धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों(Minority Classes) को अपनी पसंद की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करने और प्रशासन का अधिकार होगा और राज्य इस आधार पर शिक्षा संस्थाओ को आर्थिक सहायता देने के लिए कोई विभेद नही करेगा।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to constitutional remedies)

डॉ॰ भीमराव अंबेडकर जी ने संवैधानिक उपचारों के अधिकार (Article 32-35) को संविधान का हृदय और आत्मा (Heart and soul of constitution) की संज्ञा दी थी। सांवैधानिक उपचार के अधिकार के अन्दर 5 प्रकार के प्रावधान हैं।

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) : बंदी प्रत्यक्षीकरण द्वारा किसी भी गिरफ़्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने प्रस्तुत किये जाने का आदेश जारी किया जाता है। यदि गिरफ़्तारी का तरीका या कारण ग़ैरकानूनी (Illegal) या संतोषजनक (Satisfactory) न हो तो न्यायालय व्यक्ति को छोड़ने का आदेश जारी कर सकता है।
  2. परमादेश (Mandamus) : यह आदेश उन में जारी किया जाता है जब न्यायालय को लगता है कि कोई सार्वजनिक पदाधिकारी (Public Officer) अपने कानूनी और संवैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहा है और इससे किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) प्रभावित हो रहा है।
  3. निषेधाज्ञा (Prohibition) : जब कोई निचली अदालत (lower court) अपने अधिकार क्षेत्र को अतिक्रमित कर किसी मुक़दमें की सुनवाई (hearing) करती है तो ऊपर की अदालतें उसे ऐसा करने से रोकने के लिए ‘निषेधाज्ञा या प्रतिषेध लेख’ जारी करती हैं।
  4. अधिकार पृच्छा (Quo Warranto) : जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिस पर उसका कोई कानूनी अधिकार नहीं है तब न्यायालय ‘अधिकार पृच्छा आदेश’ जारी कर व्यक्ति को उस पद पर कार्य करने से रोक देता है।
  5. उत्प्रेषण रिट (Writ Petition) : जब कोई निचली अदालत या सरकारी अधिकारी बिना अधिकार के कोई कार्य करता है तो न्यायालय (Court) उसके समक्ष Pending Cases को उससे लेकर उत्प्रेषण द्वारा उसे ऊपर की अदालत या सक्षम अधिकारी (court or competent authority) को transfer कर देता है।

अनुच्छेद 34:– जब किसी क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर निर्बन्धन

अनुच्छेद 35:- उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान

संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार की विशेषताएं: :

  1. कुछ मूल अधिकार केवल नागरिकों को दिये गये हैं, ये हैं-
  • नागरिकों के मध्य केवल मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध अनुच्छेद (15)
  • राज्य के अधीन सेवाओं में अवसर की समता का अधिकार (अनुच्छेद 16)
  • वाक् स्वतांत्रय आदि विषयक कुछ अधिकार, (अनुच्छेद 19)
  • अल्पसंख्यक वर्गो के हितों का संरक्षण, (अनुच्छेद 29)
  • शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गो का अधिकार, (अनुच्छेद 30)

उक्त पाँचों के अतिरिक्त भारत में निवास करने वाले व्यक्तियों को जो भारत के नागरिक न हो, संविधान में अन्तर्विष्ट सभी मूलाधिकार प्राप्त हैं।

2. मूल अधिकारों पर युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाये जा सकते हैं, ताकि व्यक्तिगत अधिकारों को जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए सीमित किया जा सके। निर्बन्धन युक्तियुक्त  है या नही, इसका निर्णय न्यायालय करता है।

3. अनुच्छेद 20 तथा 21 में अन्तर्विष्ट मूलाधिकारों (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बंध में संरक्षण तथा प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) को छोड़कर सभी मूलाधिकार राष्ट्रीय आपातकाल में निलंबित हो जाते हैं। राष्ट्रीय आपातकाल में अनुच्छेद 19 में अन्तर्विष्ट मूलाधिकार (वाक् स्वातन्त्र्य आदि विषयक कुछ अधिकार) स्वतः निलंबित हो जाते है, जबकि अन्य मूलाधिकार राष्ट्रपति के आदेश से निलंबित होते हैं।

4. मूल अधिकारों का निलंबन किया जा सकता है लेकिन संविधान से इन्हे निकाला नहीं जा सकता।

5. संविधान में अंतर्विष्ट मूलाधिकारों में से कुछ नकारात्मक है क्योंकि वे राज्य की शक्ति को सीमित करते है, जैसे अनुच्छेद 15 में वर्णित मूलाधिकार जबकि कुछ अधिकार सकारात्मक है, जो नागरिको को स्वतंत्रताएं प्रदान करते हैं, जैसे अनुच्छेद 19 में उल्लिखित मूलाधिकार।

6. मूल अधिकारों का अल्पीकरण नहीं किया जा सकता। मूल अधिकारों का अल्पीकरण करने वाली विधियां अल्पीकरण करने की सीमा तक शून्य होती है। (अनुच्छेद 13) (2)

7. मूल अधिकारों की उलंघन की स्थिति में उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर अनुतोष प्राप्त किया जा सकता है।

8. जिन व्यक्तियों को मूलाधिकार प्रदान किया गया है, वे उनका अधित्याग नहीं कर सकते।

Fundamental Rights FAQ:

हमारे मौलिक अधिकार कौन कौन से हैं?

भारतीय संविधान द्वारा भारत के प्रत्येक नागरिक को 6 तरह की मौलिक अधिकार प्रदान किय गए हैं। 1. समानता का अधिकार, 2. स्वतंत्रता का अधिकार , 3. शोषण के विरूद्ध अधिकार, 4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, 5.शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार, 6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

फंडामेंटल राइट्स कहाँ से लिया गया?

फंडामेंटल राइट्स कहाँ अमेरिका से लिया गया है।

मौलिक अधिकार क्यों आवश्यक है?

मौलिक अधिकार वे अधिकार होते हैं जो संविद्धान द्वारा देश के नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं, ये अधिकार व्यक्ति सर्वांगीण विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं, ये अधिकार तानाशाही शासन से रक्षा करता है, शोषण होने बचाता है, न्याय दिलाता है।

सर्वाधिक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार कौन सा है?

संविधान द्वारा भारत के प्रत्येक नागरिकों को छः तरह के मौलिक अधिकार प्रदान किये गए हैं, ये सभी अधिकार लोगों के सर्वांगीण लिए अति महत्वपूर्ण हैं, डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संवैधानिक उपचारों के अधिकार को ांविधान का आत्मा कहा है।

मौलिक कर्तव्य कितने है?

संविधान में 11 तरह के मौलिक कर्तव्य निहित हैं।

नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षक कौन है?

नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षक उच्चतम न्यायलय है, जो की दिल्ली में स्थित है।

अब तक भारतीय संविधान में कितने संशोधन हो चुके हैं?

भारतीय संविधान में अब तक 103 संसोधन हो चुके हैं।

भारतीय संविधान में मूल अधिकार कहाँ से लिए गए हैं?

भारतीय संविधान में मूल अधिकार अमेरिका के संविधान से लिया गया है।

भारतीय संविधान में प्रथम मौलिक अधिकार कौन सा है?

समानता का अधिकार भारतीय संविधान में प्रथम मौलिक अधिकार है।

मौलिक अधिकारों में संशोधन कौन कर सकता है?

मौलिक अधिकारों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन या संशोधन संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत से किया जा सकता है।

मौलिक अधिकारों का निलंबन कौन कर सकता है?

अनुच्छेद 359 के तहत, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए किसी भी न्यायालय को स्थानांतरित करने का अधिकार, निलंबित करने के लिए अधिकृत है।

मौलिक अधिकार कब लागू हुआ?

26 जनवरी 1950, को जब भारत में संविधान लागु किया गया था, तब संविधान के लागु होते ही मालिक अधिकार स्वतः लागु हो गए थे।

कौन सा अधिकार नागरिकों को अदालत में जाने की अनुमति देता है?

अनुच्छेद 32 के तहत सभी भारतीय नागरिकों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय में जाने की अनुमति देता है।

मूल अधिकारों पर प्रतिबंध कौन लगा सकता है?

आपातकाल की स्थिति में संसद मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगा सकता है?

मौलिक अधिकार क्यों आवश्यक है?

देश के नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए मौलिक अधिकार आवश्यक है?

संपत्ति के मौलिक अधिकार को कब समाप्त किया गया?

1978 में 44वे संविधान संसोधन में संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटा दिया। गया

अनुच्छेद ३०० क्या है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 300 a संपत्ति के अधिकार से संबंधित है।

संपत्ति अधिकार की वर्तमान स्थिति क्या है?

अनुच्छेद 31 में संपत्ति के अधिकार का वर्णन था, किन्तु 44वें संविधान संशोधन के द्वारा 1978 में संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से विधिक अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया।
वर्तमान में संपत्ति का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300(a) के अंतर्गत एक विधिक अधिकार के रूप में स्थापित है।

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